August 17, 2022
कारगिल युद्ध की गाथा सुनकर खड़े हो जाएंगे रोंगटे, 17 गोलियां लगने के बावजूद पाकिस्तानियों को हराया

Hearing the saga of Kargil war, you will stand up, defeat the Pakistanis despite 17 bullets

साहिबाबाद। कारगिल युद्ध में 20 साथी बलिदान हो गए और 17 गोलियां लग चुकी थीं, किंतु परमवीर चक्र विजेता योगेंद्र सिंह यादव का जज्बा नहीं डिगा। जिन मुश्किल हालात में उन्होंने जंग लड़ी, वह गाथा सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। योगेंद्र सबसे कम उम्र में परमवीर चक्र से अलंकृत होने वाले योद्धा हैं।

31 दिसंबर को आर्मी से सेवानिवृत्त होने के बाद वह साहिबाबाद के लाजपत नगर में परिवार के साथ रहते हैं। अब वह देशभर के स्कूल कालेजों में विद्यार्थियों को अपनी शौर्यगाथा के जरिये राष्ट्रधर्म सर्वप्रथम के प्रति जागरूक कर रहे हैं। योगेंद्र बताते हैं कि सन 1999 में साढ़े 16 फीट ऊंची टाइगर हिल बर्फ से ढकी थी।
तापमान-30 डिग्री सेल्सियस था। बर्फीले तूफान के बीच पहाड़ी पर चढऩा आसान नहीं था। पाकिस्तानी सेना ऊंचाई पर थी। दिन में चढ़ते तो पाकिस्तानी सेना देख लेती और आसानी से उनकी गोली के शिकार हो जाते। योगेंद्र 20 साथियों के साथ बर्फीले तूफान को चीरते हुए रात में दुश्मनों की तरफ बढ़ते और दिन में छिप जाते।

उन्होंने बताया कि तीसरी रात की सुबह हमारा दस्ता टाइगर हिल की चोटी के पास था। तभी पाकिस्तानी सेना ने हमें देख लिया। उनके दस्ते पर पाकिस्तानी सैनिकों ने गोलियों की बौछार कर दी। भारतीय जवानों ने अदम्य साहस दिखाते हुए पाकिस्तानी सेना के कई सैनिकों को मार गिराया और 14 साथी बलिदान हो गए। सिर्फ सात लोग टाइगर हिल पर पहुंचे। कई पाकिस्तानियों को मार गिराया।
इस लड़ाई में उनके छह साथी घायल हो गए। योगेंद्र साथियों को चिकित्सीय सेवा दे ही रहे थे कि इसी दौरान दुश्मन की गोली उनके दोस्त के भेजे को पार करती हुई निकल गई।

मूलरूपी से बुलंदशहर के औरंगाबाद अहीर गांव के योगेंद्र के पिता करन सिंह यादव भी सेना में थे। उनके पिता ने 1965 और 1971 में पाकिस्तानी सेना से जंग लड़ी। बड़े भाई जितेंद्र यादव भी सेना में रहे। योगेंद्र महज 16 साल पांच माह की उम्र में भारतीय सेना में पहुंच गए। वर्ष 1999 में उनकी शादी हुई। उनकी पत्नी गर्भवती थीं तभी मुख्यालय से पत्र आया। वह बिना देर किए घर से निकल गए। जम्मू पहुंचे तो पता चला कि कारगिल जाना है।

वहां पांच घंटे तक लगातार फायरिंग की। जब बहुत कम मात्र में हथियार बचे तो हमने रणनीति बनाई। एकदम से शांत हो गए और दुश्मन का इंतजार करने लगे।
दिन के करीब बारह बजे पाकिस्तान के ग्यारह से बारह सैनिक देखने आए कि भारत के कितने जवान बचे हैं। वे जैसे ही दिखे हमने एक साथ हमला बोल उन्हें मौत के घाट उतार दिया।
योगेंद्र को लगीं 17 गोलियां फिर भी लड़ी जंग

योगेंद्र ने बताया कि पाकिस्तानी सैनिकों ने उनपर भी गोलियां चला दीं। ग्रेनेड का एक हिस्सा पैर में लगा। उन्हें लगा कि उनका पैर कट गया है। वह जख्मी होकर गिर पड़े, लेकिन उन्हें विश्वास था कि जब तक सीने या सिर में गोली नहीं लगेगी तब तक वह जीवित रहेंगे। पाकिस्तानी सैनिकों ने बलिदान हुए योगेंद्र के साथियों पर गोलियां दागीं।

योगेंद्र पर भी गोलियां चलाईं। उनके हाथ और पैरों में 17 गोलियां लगीं। इसके बाद सीने में गोली चलाई, लेकिन जेब में रखे पांच रुपये के सिक्कों ने उनकी जान बचा ली। दर्द बहुत था, लेकिन दुश्मनों के सामने ऐसे लेटे रहे मानों शरीर में प्राण नहीं है। इसके बाद पाकिस्तानी सैनिक योगेंद्र व उनके साथियों के हथियार लूट ले गए। योगेंद्र सिंह यादव जब कारगिल युद्ध के बारे में बताते हैं तो उनके चेहरे पर चमक और आवाज बुलंद हो जाती है। वह बताते हैं कि टाइगर हिल पर दिन में नहीं चढ़ा जा सकता था। आगे बढ़ते समय पहाड़ी पर एक संकीर्ण रास्ता भी आया, जिसमें सिर्फ रस्सी के सहारे ऊपर जा सकते थे।

जब हम रस्सी के सहारे जाने लगे तो दोनों तरफ से दुश्मनों के बंकर से फायरिंग शुरू हो गई। इसके बावजूद हम सात जवान ऊपर चढ़ गए। अंधाधुंध फायरिंग कर दुश्मनों को मौत के घाट उतार दिया। वहां हम एक कदम आगे रखते तब भी मौत थी और पीछे रखते तब भी मौत थी, लेकिन भारतीय फौजी कभी भी अपने कदम पीछे नहीं हटाता है। उसके कदम हमेशा दुश्मन की ओर बढ़ते हैं। हम आगे की तरफ भागे।
सबसे कम उम्र में मिला सबसे बड़ा शौर्य सम्मान

10 मई 1980 को जन्मे योगेंद्र सिंह यादव सबसे कम उम्र में परमवीर चक्र पाने वाले योद्धा हैं। महज 19 साल की उम्र में जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध में अप्रतिम शौर्य दिखाया था। इसके लिए उन्हें जनवरी 2000 को तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने परमवीर चक्र से अलंकृत किया। बरेली स्थित रूहेलखंड विश्वविद्यालय ने उनको मास्टर आफ लिटरेचर (डिलीट) की मानद उपाधि दी। योगेंद्र को सेना में मानद लेफ्टिनेंट की उपाधि दी गई है।

योगेंद्र ने बताया एक पाकिस्तानी सैनिक का पैर उनके पैर से टकराया तो उन्हें अहसास हुआ की वह जिंदा हैं। उन्होंने सोचा कि अब तक जीवित हूं तो जिंदा ही रहूंगा। दुश्मनों ने नीचे मेरी पोस्ट पर हमला करने की रणनीति बनाई थी। उनकी आवाज जब मेरे कान पर पड़ी तो मुङो लगा कि मेरी टुकड़ी खत्म हो जाएगी। मैंने ईश्वर से प्रार्थना की कि इतनी शक्ति दें कि मैं साथियों तक सूचना पहुंचा सकूं।

योगेंद्र ने हथियार लूटकर जा रहे पाकिस्तानी सैनिकों पर ग्रेनेड फेंक दिया। इससे कई पाक सैनिकों की मौत हो गई। जो बचे वे भागकर छिप गए। पाक सैनिकों को लगा कि भारतीय सेना आ गई है। योगेंद्र के पास पाकिस्तानी सैनिकों के हथियार आ गए। उनका बायां हाथ और दोनों पैर गोलियों से छलनी हो चुके थे। उन्होंने अपना हाथ उखाड़कर फेंकने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए। इसके बाद हाथ को पीठ पर टिका दिया और लेटकर एक हाथ से हथियार चलाने लगे। जान पर खेलकर पाकिस्तानी सैनिकों को मौत के घाट उतारा। उन्होंने पाकिस्तान के तीन बंकरों पर कब्जा किया। पाकिस्तानी सैनिकों की सूचना हासिल कर ली। इसके बाद एक नाले के सहारे नीचे अपनी पोस्ट के पास पहुंचे।

उन्होंने टाइगर हिल पर दुश्मनों की लोकेशन के बारे में पूरी जानकारी दी। इसके बाद वह बेहोश हो गए और जब होश आया तो अस्पताल में भर्ती थे। उनसे मिली जानकारी के आधार पर भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना पर हमला कर टाइगर हिल पर फतह हासिल की। योगेंद्र करीब 16 महीने तक अस्पताल में रहे। कारगिल युद्ध को याद कर योगेंद्र की आंखें इस वजह से नम हो जाती हैं।
योदेंग्र ने बताया कि नौकरी से पहले वर्ष 1995 में कांवड़ लाया था। अब नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद इस बार हरिद्वार से कांवड़ लाने गए हैं। उन्होंने बताया कि भगवान ने सबकुछ दिया है। वह अपनी श्रद्धा और भगवान शिव की भक्ति के लिए कांवड़ ला रहे हैं।

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