Gorakhpur। मंगलवार को अल कलम एसोसिएशन की ओर से मकतब इस्लामियात के बच्चों को नेक बंदों की दरगाह, मजार, कब्रिस्तान और मस्जिद में अदब के साथ हाजिर होने का सही तरीका सिखाया गया। सफर व खाना खाने का सुन्नत तरीका भी बताया गया। बच्चों को सबसे पहले बुलाकीपुर स्थित दरगाह हजरत मुकीम शाह रहमतुल्लाह अलैह पर ले जाया गया। हाजिरी के आदाब बताए गए। इसके बाद बच्चों को नार्मल स्थित दरगाह हजरत मुबारक खां शहीद रहमतुल्लाह अलैह ले जाया गया। यहां मजार पर उलमा किराम ने बच्चों को सलाम पेश करने और फातिहा पढ़ने का तरीका सिखाया। इसके बाद बच्चों को हजरत मुबारक खां शहीद कब्रिस्तान में हाजिर होने के आदाब सिखाए गए। कब्रिस्तान में दफन मुर्दों को सलाम पेश करने का तरीका, फातिहा पढ़ने व शरीअत के मुताबिक इसाले सवाब करने का तरीका सिखाया गया।
वहीं बच्चों ने अंत में जाफरा बाजार स्थित हजरत मीर सैयद कयामुद्दीन शाह रहमतुल्लाह अलैह की मजार पर हाजिरी दी। सब्जपोश हाउस मस्जिद जाफरा बाजार में आखिरी दुआ की गई।
मस्जिद के इमाम हाफिज रहमत अली निजामी ने बताया कि मजार (सूफी संतों की दरगाह) पर जाने का एक खास शिष्टाचार (अदब) और तरीका होता है। जिसका हम सबको पालन करना चाहिए। मजार पर हाजिरी के आदाब में अदब (सम्मान) के कुछ दूर खड़े होकर कुरआन-ए-पाक पढ़ें। दुरूद ओ सलाम पढ़ें। फातिहा ख्वानी करें और अल्लाह से दुआ मांगें। मजार का सजदा व तवाफ हराम है। मजार पवित्र जगह है यहां शरीअत के खिलाफ कोई काम न करें। मजार के बिल्कुल करीब न जाएं, बल्कि दो चार हाथ की दूरी पर रुकें, ताकि बेअदबी न हो। अल्लाह से दुआ मांगें कि वो औलिया किराम के वसीले से हमारी हर मुश्किल को आसान कर दे। जिस तरह दरगाह पर आए थे, उसी अदब के साथ दरगाह से बाहर निकलें। मजार पर जाना एक रूहानी सफर है जहां अल्लाह के नेक व करीबी बंदों (औलिया किराम) को सम्मान दिया जाता है। उनसे मोहब्बत की जाती है।
इस्लामिक स्कॉलर कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी ने बताया कि मजार पर जाना अल्लाह से जुड़ने, औलिया किराम की शिक्षाओं को याद करने और उनके जरिए अल्लाह से अपनी दुआएं मांगने का एक तरीका है, जिसमें पूरी अकीदत और सही दीनदारी का ख्याल रखना जरूरी है। पाक साफ होकर दरगाह के अंदर अदब के साथ दाखिल हों। शोर न करें और अपनी आवाज को धीमा रखें। मजार के पास पहुंचकर अदब से खड़े हों और साहिब-ए-मजार को सलाम करें। कुरआन की कुछ आयतें पढ़कर उसका सवाब साहिब-ए-मजार को बख्शें। औलिया किराम के वसीले से अल्लाह से दुआ मांगें। मजार को सजदा व तवाफ करना हराम है। मजार को चूमने या हाथ लगाने के बजाय अदब से फासले पर खड़े रहना बेहतर है। वापसी के समय भी अदब का ख्याल रखें। यदि संभव हो, तो दरगाह के आसपास मौजूद गरीबों और जरूरतमंदों की मदद भी करें।
सभी मजारात पर दुरूद ओ सलाम पढ़कर मुल्क में आपसी भाईचारे, मुहब्बत, तरक्की, अमन, शांति की दुआ मांगी गई।
इस मौके पर मुजफ्फर हसनैन रूमी, हाफिज आमिर हुसैन निजामी, मोहम्मद आसिफ, हसन, रूशान, अली शान, जावेद, जीशान, शायान, रहमत अली, हाजी बदरुल, मेराज अहमद, अल्जार, अली अबान, अब्दुस्समद, मोहम्मद सफियान, मोहम्मद फरहान, सहित तमाम बच्चे मौजूद रहे।




