गोरखपुर। मिशन शक्ति के तहत रविवार को अल इस्लाह एजुकेशनल एंड वेलफेयर सोसाइटी की ओर से जामिया अल इस्लाह एकेडमी नौरंगाबाद, गोरखनाथ में महिला सशक्तिकरण पर एक संगोष्ठी का आयोजन हुआ।
मुख्य वक्ता वरिष्ठ शिक्षक मुजफ्फर हसनैन रूमी ने कहा कि इस्लाम में महिला सशक्तिकरण का आधार समानता, गरिमा और अधिकारों पर टिका है। इस्लाम ने चौदह सौ साल पहले महिलाओं को वे अधिकार दिए जो आधुनिक समाज अब तक नहीं दे सका है। इस्लाम में शिक्षा प्राप्त करना हर मुस्लिम पुरुष और महिला का अनिवार्य कर्तव्य है। पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की पत्नी हजरत आयशा अपने समय की सबसे बड़ी विद्वान और न्यायविद् थीं। मुस्लिम महिलाओं को संपत्ति रखने, व्यवसाय करने और अपनी कमाई पर पूरा नियंत्रण रखने का अधिकार है। इस्लाम ने महिलाओं को पिता, पति और बेटे की संपत्ति में कानूनी हिस्सेदार बनाया है। विवाह के समय मिलने वाला श्मेहरश् पूरी तरह महिला का अपना हिस्सा होता है। इतिहास गवाह है कि इस्लाम की शुरुआती दौर में महिलाएं युद्धों में नर्स के रूप में, व्यापार में और महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णयों में शामिल रहती थीं। इस्लाम महिलाओं को एक सशक्त पहचान देता है।
संचालन करते हुए वरिष्ठ शिक्षक अली अहमद, आसिफ महमूद व कारी मुहम्मद अनस नक्शबंदी ने कहा कि इस्लाम में महिला सशक्तिकरण का मतलब महिलाओं को शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता, सामाजिक और राजनीतिक भागीदारी जैसे कई अधिकार देकर उन्हें सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन देना है, जो उन्हें शोषण से बचाता है और समाज में सक्रिय भूमिका निभाने में सक्षम बनाता है। इस्लाम में लड़कियों की तालीम व तरबियत को बहुत महत्व दिया गया है। आज बहुत सी मुस्लिम महिलाएं हिजाब पहनकर अस्पतालों, बैंकों और स्कूलों में काम करती हैं, जो इस्लामी सिद्धांतों के अनुसार सशक्तिकरण का उदाहरण है। इस्लाम महिला और पुरुष दोनों को समाज के कल्याण के लिए अवसर देता है।
संगोष्ठी में आयशा खातून, शीरीन आसिफ, आरजू, गुल अफ्शा, अदीबा, फरहीन, सना साफिया, नाजिया, फरहत, यासमीन, आयशा, तानिया, सैयदा, शाहीना आदि मौजूद रहीं।



