जयपुर। ग़ौसे आज़म फाउंडेशन के चेयरमैन व चीफ़ क़ाज़ी, हज़रत मौलाना सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि आज समाज को सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि दीन, मज़हब और धार्मिक मंचों को व्यापार, दिखावे और व्यक्तिगत प्रसिद्धि का साधन बनने से बचाया जाए। उन्होंने कहा कि इस्लाम कोई तमाशा व इवेंट नहीं, बल्कि अल्लाह की वह पवित्र अमानत है, जिसकी हिफाज़त के लिए अंबियाए किराम, सहाबा, औलिया और उलमा-ए-हक़ ने अपनी पूरी ज़िंदगियां कुर्बान कर दीं।
उन्होंने कहा कि कभी धार्मिक जलसे समाज सुधार, इल्म, अख़लाक़ और इंसानियत की तालीम का माध्यम हुआ करते थे, लेकिन आज कई स्थानों पर वे केवल भीड़, शोर, भावनात्मक उत्तेजना और प्रचार का साधन बनते जा रहे हैं। कुछ पेशेवर तक़रीर करने वालों, नात के नाम पर व्यापार करने वालों और मंच संचालकों ने मज़हबी जज़्बात को कमाई का जरिया बना लिया है।
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने कहा कि दुखद स्थिति यह है कि आज किसी आलिम या वक्ता की कूद्र उसके इल्म, तक़वा और किरदार से नहीं, बल्कि इस बात से की जाती है कि उसके कितने वीडियो वायरल होते हैं, कितनी भीड़ जमा होती है और उसकी कितनी मार्केट वैल्यू है। उन्होंने कहा कि जब दीन से ज़्यादा, ब्रांडिंग महत्वपूर्ण हो जाए, तो समाज का नैतिक पतन शुरू हो जाता है।
उन्होंने यह भी कहा कि आज कुछ स्थानों पर पीरी-मुरीदी और ख़ानकाही सिलसिलों को भी ब्रांडिंग और दिखावे का माध्यम बना दिया गया है। बड़े-बड़े पोस्टर, अतिशयोक्तिपूर्ण प्रचार, कृत्रिम महिमामंडन और भीड़ जुटाने की प्रतिस्पर्धा ने रूहानियत की सादगी और तसव्वुफ़ की असल रूह को नुकसान पहुंचाया है। सच्चे औलिया और बुज़ुर्गों ने हमेशा ख़ामोशी, अख़लास, तौबा, ख़िदमत और अल्लाह की याद का पैग़ाम दिया, न कि अपनी शख़्सियत का बाज़ारी प्रदर्शन।
उन्होंने कहा कि इस्लाम ने दावत व तबलीग़ को कभी व्यापार नहीं बनाया। हमारे अकाबिर बुज़ुर्गों और औलिया ने सादगी, अख़लास और ख़ौफ़-ए-ख़ुदा के साथ दीन की सेवा की। उनकी मजलिसों में शोर नहीं बल्कि असर होता था, दिखावा नहीं बल्कि सुधार होता था।
सूफ़ी सैफुल्लाह क़ादरी ने अवाम से अपील करते हुए कहा कि वे केवल ऊंची आवाज़, भावनात्मक नारों और सोशल मीडिया प्रसिद्धि को, दीनदारी का पैमाना न बनाएं, बल्कि ऐसे उलमा और दाइयों को आगे लाएं जिनकी ज़िंदगी इल्म, अमल, सादगी और ईमानदारी का नमूना हो। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते समाज ने इस गंभीर संकट को नहीं समझा, तो आने वाली पीढ़ियां, धार्मिक कार्यक्रमों को इबादत नहीं बल्कि एक व्यवसायिक तमाशा समझने लगेंगी, जो पूरी उम्मत के लिए, अत्यंत चिंताजनक स्थिति होगी।



